भारत श्रषि-मुनियों की धरती रही है। पुरातन काल से लेकर अभी तक भारत ने बहुत से महात्माओं को देखा है, महात्माओं ने ही आध्यात्म जगत को पुन: भारत में स्थापित किया था। संत और महात्मा लोग हमारे जीवन को प्रकाशवान करते ही हैं इसी श्रंखला में आपने एक बाबा को हमेशा एक कम्बल ओढ़े देखा होगा ये ही बाबा नीम करोली बाबा हैं.

आइये जानते हैं साक्षात हनुमान जी के अंश और सदा राम नाम का सुमिरन करने वाले नीम करौली बाबा के बारे में -

वर्ष 1990 उत्तरप्रदेश के अकबरपुर गांव में जन्मे नीम करोली बाबा - एक गुरु, महान तांत्रिक और दिव्यदर्शी माने जाते हैं, इनको महाराजजी भी बोलते हैं. महाराजजी की गणना बीसवीं शताब्दी के सबसे महान संतों में होती है, महाराजजी इस युग के भारतीय दिव्यपुरुषों में से हैं। उनके पिताजी का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा था।

महाराजजी का जन्म से ही लक्ष्मी नारायण नाम रख दिया था। महज 11 वर्ष की उम्र में ही बाबा की शादी करा दी गई थी। बाद में उन्होंने अपने घर को छोड़ दिया था। । एक दिन उनके पिताजी ने उन्हें ग्राम खिमसपुर, फर्रूखाबाद के पास नीम करौली नामक ग्राम के आसपास देख लिया था । बाबा को फिर आगे इसी नाम से जाना जाने लगा।

गृह-त्याग के बाद बाबा पुरू उत्तर भारत में साधू की भाँति विचरण करने लगे थे। वृंदावन में स्थानीय निवासियों ने बाबा को चम्तकारी बाबा के नाम से संबोधित किया। उनके जीवन काल में दो बड़े आश्रमों का निर्माण हुआ था, पहला वृदांवन में और दूसरा कैंची में, जहाँ बाबा गर्मियों के महीनों को बिताते थे ।

महाराजजी के समय में 100 से ज्यादा मंदिरों का निर्माण उनके नाम से हुआ था। उन्हें अपने जीवन में लगभग 108 हनुमान मंदिर बनवाए थे। वर्तमान में उनके हिंदुस्तान समेत अमरीका के टैक्सास में भी मंदिर हैं।

बाबा को वर्ष 1960 के दशक में अन्तरराष्ट्रीय पहचान मिली। बाबा ने अपने शरीर को 11 सिंतबर , 1973 को छोड़ दिया था और अपने भगवान हनुमान जी के सानिध्य में चले गये। बाबा हम सभी के लिए प्रेरणा के स्रोत थे, माना जाये तो कलियुग में हनुमान जी ही नीम करौली बाबा के नाम से जाने गये थे।

समये का साथ-साथ इन वर्षों में नैनीताल – अल्मोड़ा सड़क पर नैनीताल से 17 किमी स्थित मंदिर अब लोगों के महत्वपुर्ण तीर्थ बन गया है। 15 जून को जब कैंची धाम का मेला होता है तब मंदिर में लाखों श्रद्धालु आतें हैं और प्रसाद पातें हैं। उनके आश्रम में जहां न केवल देशवासियों को ही वरन पूरी दुनिया को प्रसन्न और खुशहाल बनने का रास्ता मिलता है वहीं दूसरी ओर प्राचीन सनातन धर्म की संस्कृति का भी प्रचार प्रसार होता है। हमेशा एक कम्बल ओढ़े रहने वाले बाबा के आर्शीवाद के लिए भारतीयों के साथ साथ बड़ी-बड़ी विदेशी हस्तियां भी उनके आश्रम पर आती हैं।

ऐसा माना जाता है कि जब तक महाराजजी 17 वर्ष के थे, तब सारा ज्ञान उनको हो गया था, जो आज के युग के लोगों को समझ मे नहीं आता या समझने की कोशिश करते हैं. भगवान श्री हनुमान उनके गुरु है. बहुत से लोग तो उन्हें साक्षात हनुमान जी ही कहते थे। बाबा के आश्रम में सबसे ज्यादा अमेरिकी ही आते हैं। आश्रम पहाड़ी इलाके में देवदार के पेड़ों के बीच स्थित है, यहां 5 देवी-देवताओं के मंदिर हैं। इनमें हनुमानजी का भी एक मंदिर है।

बाबा के कई भक्त थे। उनमें से ही एक बुजुर्ग दंपत्ति थे जो फतेहगढ़ में रहते थे। उन्होंने अपने शरीर का त्याग 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में किया था।

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साक्षात हनुमान जी के अंश – नीम करोलि बाबा
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भारत श्रषि-मुनियों की धरती रही है। पुरातन काल से लेकर अभी तक भारत ने बहुत से महात्माओं को देखा है, महात्माओं ने ही आध्यात्म जगत को पुन: भारत में स्थापित किया था। संत और महात्मा लोग हमारे जीवन को प्रकाशवान करते ही हैं इसी श्रंखला में आपने एक बाबा को हमेशा एक कम्बल ओढ़े देखा होगा ये ही बाबा नीम करोली बाबा हैं.

आइये जानते हैं साक्षात हनुमान जी के अंश और सदा राम नाम का सुमिरन करने वाले नीम करौली बाबा के बारे में –

वर्ष 1990 उत्तरप्रदेश के अकबरपुर गांव में जन्मे नीम करोली बाबा – एक गुरु, महान तांत्रिक और दिव्यदर्शी माने जाते हैं, इनको महाराजजी भी बोलते हैं. महाराजजी की गणना बीसवीं शताब्दी के सबसे महान संतों में होती है, महाराजजी इस युग के भारतीय दिव्यपुरुषों में से हैं। उनके पिताजी का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा था।

महाराजजी का जन्म से ही लक्ष्मी नारायण नाम रख दिया था। महज 11 वर्ष की उम्र में ही बाबा की शादी करा दी गई थी। बाद में उन्होंने अपने घर को छोड़ दिया था। । एक दिन उनके पिताजी ने उन्हें ग्राम खिमसपुर, फर्रूखाबाद के पास नीम करौली नामक ग्राम के आसपास देख लिया था । बाबा को फिर आगे इसी नाम से जाना जाने लगा।

साक्षात हनुमान जी के अंश - नीम करोलि बाबा 1

गृह-त्याग के बाद बाबा पुरू उत्तर भारत में साधू की भाँति विचरण करने लगे थे। वृंदावन में स्थानीय निवासियों ने बाबा को चम्तकारी बाबा के नाम से संबोधित किया। उनके जीवन काल में दो बड़े आश्रमों का निर्माण हुआ था, पहला वृदांवन में और दूसरा कैंची में, जहाँ बाबा गर्मियों के महीनों को बिताते थे ।

महाराजजी के समय में 100 से ज्यादा मंदिरों का निर्माण उनके नाम से हुआ था। उन्हें अपने जीवन में लगभग 108 हनुमान मंदिर बनवाए थे। वर्तमान में उनके हिंदुस्तान समेत अमरीका के टैक्सास में भी मंदिर हैं।

बाबा को वर्ष 1960 के दशक में अन्तरराष्ट्रीय पहचान मिली। बाबा ने अपने शरीर को 11 सिंतबर , 1973 को छोड़ दिया था और अपने भगवान हनुमान जी के सानिध्य में चले गये। बाबा हम सभी के लिए प्रेरणा के स्रोत थे, माना जाये तो कलियुग में हनुमान जी ही नीम करौली बाबा के नाम से जाने गये थे।

समये का साथ-साथ इन वर्षों में नैनीताल – अल्मोड़ा सड़क पर नैनीताल से 17 किमी स्थित मंदिर अब लोगों के महत्वपुर्ण तीर्थ बन गया है। 15 जून को जब कैंची धाम का मेला होता है तब मंदिर में लाखों श्रद्धालु आतें हैं और प्रसाद पातें हैं। उनके आश्रम में जहां न केवल देशवासियों को ही वरन पूरी दुनिया को प्रसन्न और खुशहाल बनने का रास्ता मिलता है वहीं दूसरी ओर प्राचीन सनातन धर्म की संस्कृति का भी प्रचार प्रसार होता है। हमेशा एक कम्बल ओढ़े रहने वाले बाबा के आर्शीवाद के लिए भारतीयों के साथ साथ बड़ी-बड़ी विदेशी हस्तियां भी उनके आश्रम पर आती हैं।

ऐसा माना जाता है कि जब तक महाराजजी 17 वर्ष के थे, तब सारा ज्ञान उनको हो गया था, जो आज के युग के लोगों को समझ मे नहीं आता या समझने की कोशिश करते हैं. भगवान श्री हनुमान उनके गुरु है. बहुत से लोग तो उन्हें साक्षात हनुमान जी ही कहते थे। बाबा के आश्रम में सबसे ज्यादा अमेरिकी ही आते हैं। आश्रम पहाड़ी इलाके में देवदार के पेड़ों के बीच स्थित है, यहां 5 देवी-देवताओं के मंदिर हैं। इनमें हनुमानजी का भी एक मंदिर है।

बाबा के कई भक्त थे। उनमें से ही एक बुजुर्ग दंपत्ति थे जो फतेहगढ़ में रहते थे। उन्होंने अपने शरीर का त्याग 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में किया था।

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