ब्रज में होली
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कृष्ण राधा और उनकी गोपियों के साथ होली खेलने के लिए अपने ग्वालों के साथ नंदगांव से बरसाना आया करते थे और गोपियां उन्हें लाठियों से मारा करती थीं। तभी से यह एक रस्म बन गई। आज भी हुरियार नंदगांव से बरसाना होली खेलने जाते हैं और गोपियां उन्हें लाठी मारती हैं, इससे यह होली लट्ठमार के नाम से प्रसिद्ध हो गई। बृज में होली के सुंदर गीत फ़ाग भी गाए जाते हैं, यह बृजभाषा में होते हैं।

श्री कृष्ण और राधा की लीला स्थली होने से ब्रज क्षेत्र का चप्पा चप्पा श्री कृष्ण के रंग में रंगा हुआ है और यही कारण ब्रज और होली को एक अटूट बंधन से जोड़ता है। फागुन तो वैसे भी मस्ती का महीना है, प्रकृति का अनुपम उपहार , इसका माधुर्य ही कुछ ऐसा है कि सिर्फ इंसान ही नहीं ,पेड़-पौधे , पशु-पक्षी भी मस्त होकर झूम जाते है। प्रकृति के इस उल्लसित पर्व की मस्ती का नाम है होली। एक ऐसा त्यौहार जिसमे सिर्फ उल्लसित होने का भाव ही शेष रहता है, कोई गम नहीं , कोई द्वेषभाव नहीं, सिर्फ प्रेम और सिर्फ स्नेह।

सब जग होरी, या बृज होरी’
बृज क्षेत्र के सभी पर्व और कुछ नहीं कृष्णलीला का ही रूप है और फिर होली तो वैसे भी श्री कृष्ण का पसंदीदा त्यौहार था , इसीलिए इस क्षेत्र में होली की रंगत पूरे भारत से अलग है। होली में तो ब्रज की फिजा ही अलग होती है, एक मादकता सी छायी रहती है पूरे इलाके में। जहाँ शेष भारत में होली तीन से पांच दिन की होती है बृज क्षेत्र में पूरे माह फाग की मस्ती छायी रहती है। होली का डंडा गड़ने के साथ ही , फाग की मस्ती शुरू हो जाती है और शुरू हो जाता है प्रेम और उल्लास का यह पर्व।

फागुन लाग्यौ सखि जब तें, तब तें ब्रजमंडल धूम मच्यौ है ।
नारि नवेली बचै नहीं एक, विसेष इहैं सबै प्रेम अँच्यौ है ॥
साँझ-सकारे कही रसखान सुरंग गुलाल लै खेल रच्यौ है ।
को सजनी निलजी न भई, अरु कौन भटू जिहिं मान बच्यौ है ॥ 

फूलों की होली

वृंदावन सहित देश के कई हिस्सों में कृष्ण मंदिरों में होली के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन होते हैं जिसमें कलाकार राधा-कृष्ण का रूप धारण कर नृत्य करते हैं व फगुआ के गीत गाते हैं इसमें नृत्य के साथ-साथ एक दूसरे पर फूलों की बरसात भी की जाती है इस प्रकार फूलों की होली खेली जाती है। अबीर गुलाल को प्राकृतिक रंगों से बनाया जाता है जिससे वातावरण भी मनमोहक हो जाता है। फूलों की खुशबू तो आनंदित करती ही है।

कृष्ण की जन्मभूमि और कार्यस्थली होने के कारण ब्रज में उनके लिए एक विशेष प्रेम है। कृष्ण उनके सखा भी है और आराध्य भी। अपने आराध्य से इस प्रकार का सहज संबंध अति विशिष्ट है। इसलिए इस त्यौहार में हम सब को कृष्ण के प्रेमभाव और उल्लसित स्वभाव के दर्शन होते है।

माना जाता है कि कृष्ण राधा और उनकी गोपियों के साथ होली खेलने के लिए अपने ग्वालों के साथ नंदगांव से बरसाना आया करते थे और गोपियां उन्हें लाठियों से मारा करती थीं। तभी से यह एक रस्म बन गई। आज भी हुरियार नंदगांव से बरसाना होली खेलने जाते हैं और गोपियां उन्हें लाठी मारती हैं, इससे यह लट्ठमार होली के नाम से प्रसिद्ध हो गई।

नंदगांव के हुरियार यूं ही होली खेलने बरसाना नहीं पहुंच जाते, उनके लिए विधि-विधान से लट्ठमार होली खेलने का निमंत्रण जाता है और हुरियार अपने ढाल लेकर होली खेलने पहुंच जाते हैं। इसके साथ ही बरसाने की महिलाएं रंग घोलकर, लट्ठ लेकर अपनी पूरी तैयारी रखती हैं। इस होली में प्रयुक्त लट्ठ से किसी को चोट न लगे इसका भी विशेष ध्यान रखा जाता है। कुछ इसी तरह से गोपियां भी कृष्ण को रंग लगाने के लिए विभिन्न उपक्रम करती हैं। अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं , कोई ऊंच-नीच नहीं , सुन्दर होने का गुमान भी नहीं , ब्रजवासी सब भेद भूलाकर, होली की मस्ती में मस्त है ।

कृष्ण के साथ अपनत्व का यह आलम है की लगभग हर होली गीत कृष्ण से जुड़ा हुआ है, यही अपनत्व है , यही स्नेह है जो लोगो को होली से जोड़े रखता है। ब्रज के तो कण कण में राधा -कृष्ण विराजते है , दिन की शुरुवात ही राधे-राधे से होती है । हर व्यक्ति राधा -कृष्ण से एक आत्मीय सम्बन्ध मानता है , हर व्यक्ति का जीवन इनके इर्द-गिर्द ही घूमता है। होली में तो यह आत्मीयता अपने चरम पर होती है। इस क्षेत्र की हर महिला कृष्ण को अपना सखा मानकर ही जीती है , एक ऐसा अंतरंग मित्र जिसके सामने उसे अपने दुखड़े खोल कर रख देने से कोई परहेज़ नहीं । बृज में सिर्फ अबीर और गुलाल की होली ही नहीं होती बल्कि यहां फूलों और लड्डू की होली भी होती है। इस क्षेत्र में बहुत से मंदिर हैं और यहां पर अनेक प्रकार के फूलों को भक्तों पर उड़ाया जाता है।

आज बिरज में होरी रे रसिया होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया…

कौन के हाथ कनक पिचकारी, कौन के हाथ कमोरी रे रसिया॥
कृष्ण के हाथ कनक पिचकारी, राधा के हाथ कमोरी रे रसिया॥
अपने-अपने घर से निकसीं, कोई श्यामल, कोई गोरी रे रसिया॥
उड़त गुलाल लाल भये बादर, केशर रंग में घोरी रे रसिया॥

बाजत ताल मृदंग झांझ ढप, और नगारे की जोड़ी रे रसिया॥
कै मन लाल गुलाल मँगाई, कै मन केशर घोरी रे रसिया॥
सौ मन लाल गुलाल मगाई, दस मन केशर घोरी रे रसिया॥
‘चन्द्रसखी’ भज बाल कृष्ण छबि, जुग-जुग जीयौ यह जोरी रे रसिया॥

ब्रज में हर मंदिर की अपनी एक अलग होली और उस होली की एक अलग विशेषता। ब्रज की होली की छटा ही निराली है , महीने भर चलने वाले इस उत्सव की भव्यता और विविधता देखते ही बनती है। रंग-गुलाल के साथ साथ लड्डू की होली , फूलो की होली , होली के हुरयारे , लठ्ठमार होली की अपनी विशेषताए है।

ब्रज की होली की अनूठी विशेषता है , लोगो की आत्मीयता, उल्लास और राधा-कृष्ण से लगाव। यही आत्मीयता और लगाव है जो होली खेलते लोगो के चेहरे से झलकता है और हर बाहरी व्यक्ति को भी उत्साहित करता है की हर गम ,हर परेशानी को भूलकर राधाकृष्ण की इस लीला में खो जाए।

News Reporter

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