हाल ही में ऑस्ट्रेलिया की एक सांसद ने पूरी दुनिया में सुर्ख़ियां बटोरीं. ग्रीन पार्टी की सांसद लारीसा वाटर्स ने संसद के भीतर ही वोटिंग के दौरान अपनी दो महीने की बेटी को स्तनपान कराया. लारीसा का अपनी बेटी को संसद में दूध पिलाना पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरने वाली घटना बन गई.

हालांकि ख़ुद लारीसा का कहना था कि मांएं तो आदि काल से अपने बच्चों को स्तनपान कराती आ रही हैं, इसमें इतना चौंकाने वाली बात नहीं थी. वाक़ई, मां और बच्चे का ये रिश्ता तो आदिकाल से चला आ रहा है. माएं अपने बच्चों को अपना दूध पिलाती आ रही हैं.

हम भी ये बात एक ज़माने से सुनते आ रहे हैं कि मां का दूध बच्चे के लिए वरदान है. बच्चे के विकास के लिए जितने भी पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है, वो सभी मां के दूध में पाए जाते हैं. अक्सर लोग अंधविश्वास के चलते बच्चे की पैदाइश के बाद मां की छाती से आने वाला पहला दूध बच्चे को पीने नहीं देते.

कुछ रिसर्च ये दावा करते हैं कि बच्चे को मां का दूध पिलाने से मां की सेहत पर कई बार बुरा असर पड़ता है. कई बार ख़ुद बच्चे पर मां का दूध पीने से बुरा असर पड़ता है. बच्चे के जन्म के बाद मां में वैसे भी कमज़ोरी बहुत आ जाती है. ऐसे में बच्चे को दूध पिलाने से मां पर बुरा असर पड़ता है. कमज़ोरी की वजह से ही बहुत-सी माओं को दूध भी कम उतरता है. और अगर इसी हालत में मां बच्चे को दूध पिलाती रहती है तो बच्चे के शरीर में पानी की कमी हो जाती है.

कई बार बच्चे के दिमाग़ के विकास पर भी इसका बुरा असर पड़ता है. बच्चे को मां का दूध दिया जाए या फिर फ़ॉर्मूला मिल्क दिया जाए इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. अहम सवाल ये है कि बच्चे के शरीर में उसके विकास के लिए ज़रूरी सभी पोषक तत्व उचित मात्रा में जाएं.

वैसे भी बच्चे की परवरिश को लेकर आज माहौल काफ़ी बदल चुका है.

लिहाज़ा बच्चों के खान-पान के अंदाज़ भी बदल गए हैं. बीसवीं सदी की शुरुआत में जब बच्चों के लिए फ़ॉर्मूला मिल्क बनाने वाली कंपनियों ने प्रचार करना शुरू किया तो इसी बात पर ज़ोर दिया गया कि उनका बनाया दूध मां के दूध से ज़्यादा बेहतर है. फ़ॉर्मूला मिल्क को लेकर विकासशील देशों की अपनी समस्या थी.

वहां पर अक्सर ये दूध पाउडर के रूप में बिकता था. लोगों को बच्चे के दूध की बोतल पकाने और पाउडर दूध को पानी में घोलकर तैयार करने के लिए साफ़ पानी ही नहीं था. लिहाज़ा विकासशील देशों में इन कंपनियों के ख़िलाफ़ आवाज़ तेज़ी से बुलंद होने लगी. नेस्ले कंपनी के ख़िलाफ़ तो बाक़ायदा मुहिम चलाई गई.

मां के दूध के साथ फ़ॉर्मूला मिल्क के इस्तेमाल पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए. इससे बच्चा सिर्फ़ मां के दूध पर ही निर्भर नहीं रहेगा. ये मां की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए कि वो अपने बच्चे को दूध पिलाए या नहीं. वैसे तो हर मां यही चाहेगी कि वो अपने बच्चे को अपना ही दूध पिलाए. लेकिन अगर किसी कारण से वो ऐसा नहीं कर पाती है तो उसके पास अपने बच्चे के लिए दूसरे विकल्प भी मौजूद होने चाहिए.

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स्तनपान कराने से पड़ता है मां की सेहत पर असर
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हाल ही में ऑस्ट्रेलिया की एक सांसद ने पूरी दुनिया में सुर्ख़ियां बटोरीं. ग्रीन पार्टी की सांसद लारीसा वाटर्स ने संसद के भीतर ही वोटिंग के दौरान अपनी दो महीने की बेटी को स्तनपान कराया. लारीसा का अपनी बेटी को संसद में दूध पिलाना पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरने वाली घटना बन गई.

हालांकि ख़ुद लारीसा का कहना था कि मांएं तो आदि काल से अपने बच्चों को स्तनपान कराती आ रही हैं, इसमें इतना चौंकाने वाली बात नहीं थी. वाक़ई, मां और बच्चे का ये रिश्ता तो आदिकाल से चला आ रहा है. माएं अपने बच्चों को अपना दूध पिलाती आ रही हैं.

हम भी ये बात एक ज़माने से सुनते आ रहे हैं कि मां का दूध बच्चे के लिए वरदान है. बच्चे के विकास के लिए जितने भी पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है, वो सभी मां के दूध में पाए जाते हैं. अक्सर लोग अंधविश्वास के चलते बच्चे की पैदाइश के बाद मां की छाती से आने वाला पहला दूध बच्चे को पीने नहीं देते.

कुछ रिसर्च ये दावा करते हैं कि बच्चे को मां का दूध पिलाने से मां की सेहत पर कई बार बुरा असर पड़ता है. कई बार ख़ुद बच्चे पर मां का दूध पीने से बुरा असर पड़ता है. बच्चे के जन्म के बाद मां में वैसे भी कमज़ोरी बहुत आ जाती है. ऐसे में बच्चे को दूध पिलाने से मां पर बुरा असर पड़ता है. कमज़ोरी की वजह से ही बहुत-सी माओं को दूध भी कम उतरता है. और अगर इसी हालत में मां बच्चे को दूध पिलाती रहती है तो बच्चे के शरीर में पानी की कमी हो जाती है.

कई बार बच्चे के दिमाग़ के विकास पर भी इसका बुरा असर पड़ता है. बच्चे को मां का दूध दिया जाए या फिर फ़ॉर्मूला मिल्क दिया जाए इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. अहम सवाल ये है कि बच्चे के शरीर में उसके विकास के लिए ज़रूरी सभी पोषक तत्व उचित मात्रा में जाएं.

वैसे भी बच्चे की परवरिश को लेकर आज माहौल काफ़ी बदल चुका है.

लिहाज़ा बच्चों के खान-पान के अंदाज़ भी बदल गए हैं. बीसवीं सदी की शुरुआत में जब बच्चों के लिए फ़ॉर्मूला मिल्क बनाने वाली कंपनियों ने प्रचार करना शुरू किया तो इसी बात पर ज़ोर दिया गया कि उनका बनाया दूध मां के दूध से ज़्यादा बेहतर है. फ़ॉर्मूला मिल्क को लेकर विकासशील देशों की अपनी समस्या थी.

वहां पर अक्सर ये दूध पाउडर के रूप में बिकता था. लोगों को बच्चे के दूध की बोतल पकाने और पाउडर दूध को पानी में घोलकर तैयार करने के लिए साफ़ पानी ही नहीं था. लिहाज़ा विकासशील देशों में इन कंपनियों के ख़िलाफ़ आवाज़ तेज़ी से बुलंद होने लगी. नेस्ले कंपनी के ख़िलाफ़ तो बाक़ायदा मुहिम चलाई गई.

मां के दूध के साथ फ़ॉर्मूला मिल्क के इस्तेमाल पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए. इससे बच्चा सिर्फ़ मां के दूध पर ही निर्भर नहीं रहेगा. ये मां की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए कि वो अपने बच्चे को दूध पिलाए या नहीं. वैसे तो हर मां यही चाहेगी कि वो अपने बच्चे को अपना ही दूध पिलाए. लेकिन अगर किसी कारण से वो ऐसा नहीं कर पाती है तो उसके पास अपने बच्चे के लिए दूसरे विकल्प भी मौजूद होने चाहिए.

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