तुलसी विवाह - तुलसी का विवाह शालिग्राम से इस एकादशी के दिन ही किया जाता है। तुलसी विवाह करवाने से कई जन्मों के पाप नष्ट होते हैं। तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आवाहन।  तुलसी विवाह में सोलह श्रृंगार के सभी सामान चढ़ावे के लिए रखे जाते हैं। शालिग्राम को दोनों हाथों में लेकर यजमान लड़के के रूप में यानी भगवान विष्णु के रूप में और यजमान की पत्नी तुलसी के पौधे को दोनों हाथों में लेकर अग्नि के फेरे लेते हैं। विवाह के पश्चात् प्रीतिभोज का आयोजन किया जाता है। ऐसे माना जाता है की अगर किसी व्यक्ति को कन्या नहीं है और वह जीवन में कन्या दान का सुख प्राप्त करना चाहता है तो वह तुलसी विवाह कर प्राप्त कर सकता है। जिनका दाम्पत्य जीवन बहुत अच्छा नहीं है वह लोग सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए तुलसी विवाह करते हैं। तुलसी पूजा करवाने से घर में संपन्नता आती है तथा संतान योग्य होती है।   सूर्य का वृश्चिक राशि में प्रवेश - इस वर्ष शुक्रवार 16 नवंबर को सूर्य का वृश्चिक राशि में प्रवेश हो रहा है तथा सोमवार 19 नवंबर को देवउठनी एकादशी है। पंडित रमा शंकर ने बताया कि देवउठनी के बाद मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। परंतु 12 नवंबर को गुरु के अस्त हो जाने के कारण मांगलिक कार्यक्रम नहीं हो पाएंगे। सात दिसंबर को गुरु का उदय होगा। इस कारण इस वर्ष देवउठनी एकादशी के बाद मांगलिक कार्य के लिए इंतजार करना पड़ेगा।  

तिथि और मुहूर्त 2018

पारण का समय – सुबह 6.52 बजे से 8.58 बजे तक पारण समाप्त – द्वादशी को दोपहर 2.40 बजे एकादशी तिथि अारंभ – दोपहर 1.34 बजे से (18 नवंबर) एकादशी तिथि समाप्त – दोपहर 2.30 बजे (19 नवंबर) नवंबर और दिसंबर 2018 में एकादशी व्रत तिथि देवउठनी एकादशी – सोमवार, 19 नवंबर 2018 उत्पन्ना एकादशी – सोमवार, 3 दिसंबर 2018 मोक्षदा एकादशी – मंगलवार, 18 दिसंबर २०१८  
पं. लक्ष्मी नारायण शर्मा
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देवउठनी एकादशी का महत्व
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सोमवार 19 नवंबर को देवउठनी एकादशी

वर्ष की सबसे बड़ी एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी होती है। इस एकादसी से चार महीने से बंद मांगलिक कार्य, विवाह आदि फिर से प्रारंभ हो जाते हैं।  इस एकादशी को देवउठनी एकादशी भी कहा जाता है क्यूंकि इस एकादशी को चातुर्मास का समापन होता है और भगवान विष्णु चार महीने के विश्राम के बाद पुन: जगत का कार्यभार संभालने के लिए जाग उठते हैं।

 

देवउठनी एकादशी का महत्व 1तुलसी विवाह –

तुलसी का विवाह शालिग्राम से इस एकादशी के दिन ही किया जाता है। तुलसी विवाह करवाने से कई जन्मों के पाप नष्ट होते हैं। तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आवाहन।  तुलसी विवाह में सोलह श्रृंगार के सभी सामान चढ़ावे के लिए रखे जाते हैं। शालिग्राम को दोनों हाथों में लेकर यजमान लड़के के रूप में यानी भगवान विष्णु के रूप में और यजमान की पत्नी तुलसी के पौधे को दोनों हाथों में लेकर अग्नि के फेरे लेते हैं। विवाह के पश्चात् प्रीतिभोज का आयोजन किया जाता है। ऐसे माना जाता है की अगर किसी व्यक्ति को कन्या नहीं है और वह जीवन में कन्या दान का सुख प्राप्त करना चाहता है तो वह तुलसी विवाह कर प्राप्त कर सकता है। जिनका दाम्पत्य जीवन बहुत अच्छा नहीं है वह लोग सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए तुलसी विवाह करते हैं। तुलसी पूजा करवाने से घर में संपन्नता आती है तथा संतान योग्य होती है।

 

सूर्य का वृश्चिक राशि में प्रवेश –

इस वर्ष शुक्रवार 16 नवंबर को सूर्य का वृश्चिक राशि में प्रवेश हो रहा है तथा सोमवार 19 नवंबर को देवउठनी एकादशी है। पंडित रमा शंकर ने बताया कि देवउठनी के बाद मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। परंतु 12 नवंबर को गुरु के अस्त हो जाने के कारण मांगलिक कार्यक्रम नहीं हो पाएंगे। सात दिसंबर को गुरु का उदय होगा। इस कारण इस वर्ष देवउठनी एकादशी के बाद मांगलिक कार्य के लिए इंतजार करना पड़ेगा।

 

तिथि और मुहूर्त 2018

पारण का समय – सुबह 6.52 बजे से 8.58 बजे तक
पारण समाप्त – द्वादशी को दोपहर 2.40 बजे
एकादशी तिथि अारंभ – दोपहर 1.34 बजे से (18 नवंबर)
एकादशी तिथि समाप्त – दोपहर 2.30 बजे (19 नवंबर)

नवंबर और दिसंबर 2018 में एकादशी व्रत तिथि
देवउठनी एकादशी – सोमवार, 19 नवंबर 2018
उत्पन्ना एकादशी – सोमवार, 3 दिसंबर 2018
मोक्षदा एकादशी – मंगलवार, 18 दिसंबर २०१८

 

पं. लक्ष्मी नारायण शर्मा

News Reporter

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