पुण्यतिथि विशेष : आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक थीं महादेवी वर्मा
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आज पद्म विभूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित और हिंदी साहित्य की महान रचनाकारों में एक महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि है. आज ही के दिन साल 1987 में इलाहाबाद में महादेवी वर्मा का निधन हो गया था. हिंदी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पन्त, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के साथ महादेवी वर्मा का नाम भी लिया जाता रहा है. आधुनिक हिंदी कविता में वह एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरीं.

छायावाद युग की प्रमुख लेखकों में से एक महादेवी वर्मा का आधुनिक हिंदी में अतुलनीय योगदान रहा है. महादेवी वर्मा को शिक्षा और साहित्य प्रेम एक तरह से विरासत में मिला था. उनकी शुरुआती शिक्षा इंदौर में हुई थी. महादेवी वर्मा ने बी.ए. जबलपुर से किया. वह अपने घर में सबसे बड़ी थी. साल 1932 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. की डिग्री ली.

उन्होंने खड़ी बोली हिंदी की कविता में कोमल शब्दावली का विकास किया. उनकी गणना सबसे सशक्त कवयित्रियों में की जाती है. उन्होंने अध्यापन से अपने कार्य जीवन की शुरूआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं. उनका बाल-विवाह हुआ था, हालांकि उन्होंने अविवाहित की भांति जीवन-यापन किया.

महादेवी की प्रमुख कृतियां

नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा, सप्तपर्णा, आत्मिका, परिक्रमा, सन्धिनी, रेखाचित्र: अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएं और संस्मरण: पथ के साथी.

पुरस्कार

महादेवी वर्मा को कई पुस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिसमें सेकसरिया पुरस्कार (1934), द्विवेदी पदक (1942), मंगला प्रसाद पुरस्कार (1943), भारत भारती पुरस्कार (1943) पद्म भूषण (1956) साहित्य अकादमी फेलोशिप (1979), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982) और पद्म विभूषण (1988) आदि शामिल है.

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