तीन वर्ष बाद बना मकर संक्रांति पर महासंयोग

समस्त पंचांग में उपरोक्त बातों का प्रमाण है। मकर संक्रांति वाहनं (सिंह),उपवाहन अश्व, उत्तर दिशा में गमन, दक्षिण दिशा से आगमन। 14 जनवरी मध्यरात्रि 2.21 बजे से 15 जनवरी को सूर्योदय से सूर्यास्त 5.22 मिनट तक रहेगी। इस दिन दान पुण्य का अधिक महत्व है। तिल, लड्डू, खिचड़ी, वस्त्र, कंबल, मच्छरदानी, मुद्रा दान करें। मकर संक्रांति के दिन लोग पवित्र नदियां गंगा, नर्मदा, गोदावरी में जाकर स्नान कर सूर्य को अघ्र्य देगे। मकर संक्रांति के दिन पंतगबाजी भी होगी।     राशियों पर प्रभाव : मेष-शुभ, वृष-संतोष, मिथुन-धनलाभ, कर्क-कलह, सिंह-ज्ञानवृद्धि, कन्या-यश, तुला-पदोन्नति, वृश्चिक-भय, धनु-धर्मलाभ, मकर-सिद्धि, कुंभ-विजय लाभ, मीन-हानि। मकर संक्रांति से जुड़ी गाथाएं : कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाया करते हैं। शनिदेव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन ही स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा उनसे मिली थीं। यह भी कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है। महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था।  भगवान विष्णु ने इस दिन असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी व सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है। यशोदा जी ने जब कृष्ण जन्म के लिए व्रत किया था तब सूर्य देवता उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। कहा जाता है तभी से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन हुआ। मकर संक्रांति के दिन से मौसम में बदलाव आना आरंभ होता है यही कारण है कि रातें छोटी व दिन बड़े होने लगते है। सूर्य के उत्तरी गोलार्ध की ओर जाने बढऩे के कारण ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होता है सूर्य के प्रकाश में गर्मी और तपन बढऩे लगती है इसके फलस्वरूप प्राणियों में चेतना व कार्य करने की क्षमता बढ़ती है।"/>
मकर संक्रांति – सिंह पर सवार सर्वार्थामृत सिद्धि-रवि-अश्विन मंगल योग में
Spread the love

14 जनवरी को रात्रि 2.21 बजे धनु से मकर राशि में सूर्य का प्रवेश

भोपाल। मां चामुंडा दरबार के पुजारी गुरूजी पंडित रामजीवन दुबे एवं ज्योतिषाचार्य विनोद रावत ने बताया कि पौष शुक्ल पक्ष अष्टमी सोमवार 14 जनवरी रात्रि 2.21 बजे सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करेगे। महापर्व मंगलवार 15 जनवरी को सूर्योदय से सूर्यास्त 5.22 तक रहेगा। सूर्य उत्तरायणे मकर के सूर्य श्रेष्ठ माने है। तुला लग्न में संक्रांति का प्रवेश होगा मकर लग्न में पर्व का शुभारंभ होकर स्थिर लग्न वृषभ में विशेष महत्व रहेगा। मांगलिक कार्यों का शुभारंभ होगा।

मकर संक्रांति - सिंह पर सवार सर्वार्थामृत सिद्धि-रवि-अश्विन मंगल योग में 1

तीन वर्ष बाद बना मकर संक्रांति पर महासंयोग

समस्त पंचांग में उपरोक्त बातों का प्रमाण है। मकर संक्रांति वाहनं (सिंह),उपवाहन अश्व, उत्तर दिशा में गमन, दक्षिण दिशा से आगमन। 14 जनवरी मध्यरात्रि 2.21 बजे से 15 जनवरी को सूर्योदय से सूर्यास्त 5.22 मिनट तक रहेगी। इस दिन दान पुण्य का अधिक महत्व है। तिल, लड्डू, खिचड़ी, वस्त्र, कंबल, मच्छरदानी, मुद्रा दान करें। मकर संक्रांति के दिन लोग पवित्र नदियां गंगा, नर्मदा, गोदावरी में जाकर स्नान कर सूर्य को अघ्र्य देगे। मकर संक्रांति के दिन पंतगबाजी भी होगी।

 

 

राशियों पर प्रभाव :

मेष-शुभ, वृष-संतोष, मिथुन-धनलाभ, कर्क-कलह, सिंह-ज्ञानवृद्धि, कन्या-यश, तुला-पदोन्नति, वृश्चिक-भय, धनु-धर्मलाभ, मकर-सिद्धि, कुंभ-विजय लाभ, मीन-हानि।

मकर संक्रांति से जुड़ी गाथाएं :

कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाया करते हैं। शनिदेव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन ही स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा उनसे मिली थीं। यह भी कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।

महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था।  भगवान विष्णु ने इस दिन असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी व सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है। यशोदा जी ने जब कृष्ण जन्म के लिए व्रत किया था तब सूर्य देवता उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। कहा जाता है तभी से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन हुआ।

मकर संक्रांति के दिन से मौसम में बदलाव आना आरंभ होता है यही कारण है कि रातें छोटी व दिन बड़े होने लगते है। सूर्य के उत्तरी गोलार्ध की ओर जाने बढऩे के कारण ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होता है सूर्य के प्रकाश में गर्मी और तपन बढऩे लगती है इसके फलस्वरूप प्राणियों में चेतना व कार्य करने की क्षमता बढ़ती है।

News Reporter

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *