क्यों मानते हैं शरद पूर्णिमा
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क्यों मानते हैं शरद पूर्णिमा को विशेष पूर्णिमा 

इस साल शरद पूर्णिमा 24 अक्टूबर को पड़ रहा है। इस पूर्णिमा को कोजगार पूर्णिमा भी कहते हैं। जिसको बिहार में बड़े जोर-शोर के साथ मनाया जाता है.  पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में बहुत मह्त्व होता है.

शरद पूर्णिमा को विशेष पूर्णिमा मानने के कई कारन है. जिसमे से कुछ हम आपको बताते हैं. –
सबसे पहला कारन होता है, शरद पूर्णिमा से शरद ऋतु का आरम्भ होता है।
– इस दिन चन्द्रमा संपूर्ण और सोलह कलाओं से युक्त होता है।
– इस दिन चन्द्रमा से अमृत की वर्षा होती है, जिससे धन, प्रेम और स्वास्थ्य मिलता है।
– इस रोशनी के नीचे खीर बनाकर रखने से और फिर उसको खाने से शरीर को कई तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है।
– प्रेम और कलाओं से परिपूर्ण होने के कारण श्री कृष्ण ने इसी दिन महारास रचाया था।
– शरद पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी की पूजा के साथ साथ ओम श्रीं ओम और ओम ह्वीं ओम महालक्ष्मये नम: मंत्र का 108 बार जाप करना शुभ माना गया है।

महारास खेलने में मग्न हो जाते हैं राधा-कृष्ण
चंद्र देव अपनी 27 पत्नियों- रोहिणी, कृत्तिका आदि नक्षत्रों के साथ अपनी पूरी कलाओं से भरे इस रात सभी को तृप्त करने में जुट जाते हैं। समूची सृष्टि राधे-कृष्ण, राधे-कृष्ण कर रही होती है। राधा-कृष्ण दोनों शरद पूर्णिमा को महारास खेलने में मग्न हो जाते हैं।  इन्द्र और महालक्ष्मी पूजन करते हुए कोजागर व्रत भी संपन्न होता है। पूरी रात जागना होता है एकाग्रचित होकर ईश्वर की आराधना में। चंद्रमा भी एकटक राधा-कृष्ण को महारास करते देखता रहता है।

छत पर रखी जाती है गाय के दूध से बनी खीर
शरद पूर्णिमा में रात को गाय के दूध से बनी खीर या दूध छत पर रखने का प्रचलन है। मान्यता है कि चंद्र देव द्वारा बरसाई जाने वाली चांदनी, खीर या दूध को अमृत से भर देती है। इस दिन रावण अपनी नाभि पर चंद्रमा की किरणों को लेकर पुन: शक्तिशाली होता था।

 

शरद पूर्णिमा का महत्व

शरद पूर्णिमा काफी महत्वपूर्ण तिथि है, इसी तिथि से शरद ऋतु का आरम्भ होता है। इस दिन चन्द्रमा संपूर्ण और सोलह कलाओं से युक्त होता है। इस दिन चन्द्रमा से अमृत की वर्षा होती है जो धन, प्रेम और सेहत तीनों देती है। प्रेम और कलाओं से परिपूर्ण होने के कारण कृष्ण ने इसी दिन महारास रचाया था। इस दिन विशेष प्रयोग करके बेहतरीन सेहत, अपार प्रेम और खूब सारा धन पाया जा सकता है

व्रत विधि
– इस दिन शरद पूर्णिमा इष्ट देव का पूजन करना चाहिए।
– घी के दीपक जलाकर इन्द्र और महालक्ष्मी जी की पूजा करनी चाहिए।
– रात को चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करना चाहिए।
– मंदिर में खीर आदि दान करने का विशेष महत्व है.
– शरद पूर्णिमा के दिन चमकदार सफेद रंग के वस्त्र धारण करना बहुत शुभ दायक होता hai.

ये है मान्यता
चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है। इस दिन जिस खीर को चांदी के बर्तन में बनाया जाता है. उसके भी विशेष लाभ होता है. वैज्ञानिक तौर पर चांदी में प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है, इससे जो भी विष्णु होते है वो ख़तम हो जाते है. शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों के लिए वरदान की तरह है। इस रात दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर प्रात: 4 बजे सेवन किया जाता है। रोगी को रात्रि जागरण और औ‍षधि सेवन के बाद 2-3 किमी पैदल चलना लाभदायक रहता है।  लंकाधिपति रावण भी शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इससे उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी।

कैसे मनाएँ –
इस दिन प्रात: काल स्नान करके आराध्य देव को सुंदर वस्त्राभूषणों से सुशोभित करके आवाहन, आसान, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, सुपारी, दक्षिणा आदि से उनका पूजन करना चाहिए।
रात्रि के समय गाय के दूध से बनी खीर में घी तथा चीनी मिलाकर आधी रात के समय भगवान को अर्पण करना चाहिए। पूर्ण चंद्रमा के आकाश के मध्य स्थित होने पर उनका पूजन करें तथा खीर का नैवेद्य अर्पण करके, रात को खीर से भरा बर्तन खुली चांदनी में रखकर दूसरे दिन उसका भोजन करें तथा सबको उसका प्रसाद दें।
पूर्णिमा का व्रत करके कथा सुननी चाहिए। कथा सुनने से पहले एक लोटे में जल तथा गिलास में गेहूं, पत्ते के दोनों में रोली तथा चावल रखकर कलश की वंदना करके दक्षिणा चढ़ाएँ। फिर तिलक करने के बाद गेहूं के 13 दाने हाथ में लेकर कथा सुनें। फिर गेहूं के गिलास पर हाथ फेरकर मिश्राणी के पांव स्पर्श करके गेहूं का गिलास उन्हें दे दें। लोटे के जल का रात को चंद्रमा को अर्ध्य दें।

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