रामायण का आध्यात्मिक अर्थ
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रामायण का आध्यात्मिक अर्थ

रामायण का समय त्रेतायुग का माना जाता है। भारतीय कालगणना के अनुसार समय को चार युगों में बाँटा गया है- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग एव कलियुग।

संसार के सम्पूर्ण साहित्य में रामायण के अतिरिक्त अन्य किसी ग्रन्थ ने शताबिदयों तक किसी राष्ट्र की विचारधारा एवं काव्य को इतना अधिक प्रभावित नहीं किया है, जितना कि रामायण ने।

रामायण’ एक ऐसा अमूल्य ग्रंथ है जिसमें नीतियों का अनमोल खजाना छिपा हुआ है।’रामायण’ के पात्रों को हम दुनियावी तौर-तरीकों से जब देखते हैं तो हमें अपने ही लौकिक स्वरूप की संरचना साफ-साफ दिखाई पड़ती है। श्रीराम को मर्यादा की प्रतिमूर्ति मानते हुए, हम उन्हें अपना आदर्श चरित्र समझते हैं।

आइये जानते है राम का अर्थ –

‘रा’ का अर्थ है आभा (कांति) और ‘म’ का अर्थ है मैं, मेरा और मैं स्वयं। राम का अर्थ है मेरे भीतर प्रकाश,मेरे ह्रदय में प्रकाश। निश्चय ही ‘राम’ ईश्वर का नाम है,जो इस धरती पर 7560 ईसा पूर्व अर्थात 9500 वर्ष पूर्व अवतरित हुए थे।

राम और दशरथ के सम्बन्ध का अर्थ –

राम परमचेतना का, ईश्वर का नाम है।जो हर मनुष्य के अंदर उसके हृदय में निवास करता है।मानवशरीर ‘दशरथ’ है। अर्थात दस इंद्रियाँ रूपी अश्वों का रथ। इस रथ के दस अश्व हैं – दो कान, दो आँखें, एक नाक, एक जुबान, एक (संपूर्ण) त्वचा, एक मन, एक बुद्घि और एक प्राण। इस दशरथ का सारथी है – ‘राम’। राम इंद्रियों का सूरज है। उसी के तेज से शरीर और उसकी इंद्रियाँ चल रही हैं।

जब शरीर रूपी रथ पर चेतना रूपी राम आरूढ़ होकर इस का संचालन अपने हाथों में लेते हैं तभी वह सजीव होकर अभिव्यक्ति करता है। शरीर दथरथ है तो सारथी राम, शरीर शव है तो शिव (चेतना) राम…। राम से वियोग होते ही दशरथ का अस्तित्त्व समाप्त हो जाता है।

इन दोनों का मिलन ही अनुभव और अभिव्यक्ति का, जड़ और चेतना का, परा और प्रकृति का मिलन है।अपने सारथी राम के बिना दशरथ उद्देश्यहीन है और दशरथ के बिना राम अभिव्यक्ति विहीन।

रामायण का मनुष्य के जीवन पर प्रभाव –

रामायण मनुष्य के अलग-अलग मनोभावों का ताना-बाना है। इसकी हर घटना इंसान की आंतरिक स्थिति का ही प्रतिबिंब है।रामायण में चित्रित हर चरित्र इंसान के अंदर ही मौजूद है, जो समय-समय पर बाहर निकलता है। जैसे यदि कोई इंसान किसी बाहरवाले की बातों में आकर,अपने शुभचिंतकों पर ही संदेह करने लगे तो उस वक्त वह कैकेयी है एवं जब एक इंसान किसी दूसरे इंसान के विरुद्ध किसी के कान भरता है तब वह मंथरा बन जाता है।

जब एक इंसान वासना और क्रोध जैसे विकारों के वशीभूत होकर, अपनी मर्यादा लाँघ जाए तो उस वक्त वह रावण है।

जब इंसान के अंदर रावण रूपी अहंकारी व्यक्ति हावी हो जाता है तब उसके जीवन से सत्य अनुभव यानी राम चला जाता है,तब उसकी हालत श्रीराम के जाने के बाद दुःखी, उत्सव विहीन अयोध्या जैसे हो जाती है।जब मनुष्य अपने जीवन में राम की वापसी के लिए प्रयास करता हैं तो वह अपने भीतर सत्य की ताकत को बढ़ाता है और रावण जैसे विकार और अहंकार से लड़ कर, उसे परास्त कर देता है। उसके बाद ही इंसान के जीवन में राम वापस आते हैं, अयोध्या रुपी जीवन में उत्सव, उल्लास, प्रेम, आनंद का आगमन होता है।

समाज और परिवार के लिए एक आदर्श गाथा –

रामायण मे पारिवारिक जीवन का एक उच्च आदर्श प्रतिपादित है जिससे हम सभी सुपरिचित है । राम पिता की आज्ञा मानकर साम्राज्य छोड़कर वन मे चले जाते है, सीता राजभवन का ऐश्वर्य त्याग कर पातिव्रत्य धर्म का पालन करने भयंकर अरण्य मे चली जाती है और लक्ष्मण भी भाई व भाभी की सेवा मे राजसुख को त्यागकर उनके अनुगामी बनते है। जब रावण छल से सीता को हर कर ले जाता है और श्रीराम और लक्ष्मण वन में भटक रहे थे, तभी मार्ग में उन्हें आभूषण मिलते हैं, जो माता सीता के थे। मगर लक्ष्मण कहते हैं कि प्रभु मैं इन आभूषणों को नहीं पहचानता। मैं तो केवल पैर के बिछुए को ही पहचानता हूं। वह श्रीराम को बताते हैं कि प्रभु मैंने अपनी माता के दूसरे आभूषणों को देखने की चेष्टा नहीं की केवल मां के चरणों को ही देखा है। लक्ष्मण रूपी देवर जिस घर में रहेगा उस घर का बाल बांका भी नहीं हो सकता, सभी के दिलों से वैर नामक जहर पनपना बंद होकर आपसी प्रेम व भाईचारा बढेगा। दूसरी तरफ भरत राज सत्ता पाकर भी अपने को भाइयो के बिना अधूरा समझता है और त्याग पूर्वक राज्य करते हुये अपने भाइयो के लौटने की प्रतीक्षा करता है। यहाँ कैकेयी एक आदर्श माता हैं। अपने पुत्र राम पर कैकेयी के द्वारा किये गये अन्याय को भुला कर वे कैकेयी के पुत्र भरत पर उतनी ही ममता रखती हैं जितनी कि अपने पुत्र राम पर। हनुमान एक आदर्श भक्त हैं, वे राम की सेवा के लिये अनुचर के समान सदैव तत्पर रहते हैं। शक्तिबाण से मूर्छित लक्ष्मण को उनकी सेवा के कारण ही प्राणदान प्राप्त होता है। इनके पावन चरित्र का स्मरण ही क्षुद्र स्वार्थो के कारण टूटते हमारे दाम्पत्य जीवन एवं परिवारों को बचा सकता है। रामायण हमे सही रास्ते पर ले जाने का संदेश देती है। यह हमें बखूबी सिखाती है कि मां-बाप,पति-पत्नी, भाई-बंधू व राजा-प्रजा के क्या कर्तव्य हैं।

रामायण में स्त्री अथवा नारी –

रामायण मे वर्णित कौशल्या,सीता,अनसूयादि उदात्त एवं पवित्र चरित्र आज की नारी को बहुत कुछ सीखा सकता है। आज की कुछ नारी पढ़ लिख कर सुंदर वस्त्र पहन कर बाध्य रूप से सभ्य तो हो गयी किन्तु शालीनता पवित्रता त्याग आदि गुणो से रहित होती जा रही है, नारियो के प्रति सम्मान की तो रामायण मे पराकाष्ठा ही दिखाई देती है एक जटायु नामक पक्षी भी स्त्री का अपमान होते नहीं देख सकता था उसने भी वृद्ध होते हुये अपने प्राणो की चिंता न करते हुये परम शक्तिशाली रावण के साथ युद्ध किया। यह बताता है कि हमे स्त्री के सम्मान की रक्षा करनी चाहिए ।

कुल मिलकर रामायण का हमको सिखाती है – बुराई पर अच्छाई की जीत,विविधता में एकता, अच्छी संगति का महत्व,प्यार और अटल विश्वास,विनम्र आचरण एवं क्रोध, बदला,अहम के जगह क्षमा करने का स्वाभाव ही रामायण की सबसे बड़ी सीख है।

जय श्री राम.

News Reporter

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