अभिनेत्री सुलोचना का जन्म 1907 में हुआ था. सुलोचना को रूबी मेयर्स Ruby Myers के नाम से भी जाना जाता है. ये ही उनका असलो नाम था. सुलोचना 1930 के दशक में सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री थी। 1930 के दौर में सुलोचना इंडियन फ़िल्म इंडस्ट्री की शीर्ष अभिनेत्री थीं। उन्होंने शुरुआत तो मूक फ़िल्मों के समय से की, लेकिन बोलती फ़िल्मों के दौर की शुरुआत में भी उनका सिक्का फ़िल्म इंडस्ट्री पर खूब चला। हिन्दी सिनेमा में विशेष योगदान के लिए 1973 में 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। सुलोचना अभिनेत्री बनने से पहले एक टेलीफोन ऑपरेटर थी. १९२५ ऐसा नाम की फिल्म से वे रुपहले परदे पर उतरीं और स्टार बन गई. इस दौरान उन्होंने ५० फिल्मो में काम किया. सुलोचना को हिंदी फिल्मो में उनके योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरूस्कार दिया गया.    

करियर बनाने आये कई उतार-चढ़ाव

मूक फ़िल्मों के दौर में ही सुलोचना के खाते में कई हिट फ़िल्में थीं। बोलती फ़िल्मों के आने के बाद सुलोचना का कॅरियर थोड़ा ठहर गया। सुलोचना असल में क्रिश्चियन थीं और उन्हें ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा बहुत अच्छे से नहीं आती थी। बोलती फ़िल्मों के आने के साथ ही डायलॉग बोलने की दक्षता ज़रूरी हो गई। ये सुलोचना के कॅरियर के लिए एक धक्का था। कुछ वक्त ऐसे ही चला, मगर फिर सुलोचना ने हार ना मानने का फैसला लिया। उन्होंने एक साल का ब्रेक लेकर हिन्दुस्तानी धड़ल्ले से बोलने की तालीम ली और फिर वापसी की। सबसे पहले उन्होंने 1920 के दौरान बनी अपनी फ़िल्मों का रीमेक 1930 के दौरान रिलीज किए। सभी फ़िल्में बहुत सफल हुईं और सुलोचना फिर टॉप तक पहुंच गईं। मगर 1940 से सुलोचना के कॅरियर में ढलान जो शुरू हुआ तो फिर वह संभल नहीं सकीं। नई अभिनेत्रियों के सामने सुलोचना मुकाबला नहीं कर सकीं। चरित्र भूमिकाओं के सहारे उन्होंने वापसी की कोशिश की लेकिन फिर कभी हालात पहले जैसे ना हो सके। सुलोचना (रूबी मेयर्स) ने अनारकली नाम की तीन फ़िल्में कीं। तीनों एक ही कहानी का रीमेक थीं। पहली अनारकली, जिसमें सुलोचना मुख्य अभिनेत्री थीं, मूक फ़िल्मों के दौर में बनी, जब सुलोचना ने बोलती फ़िल्मों में वापसी की तो उन्होंने अपनी फ़िल्म अनारकली को फिर से बना कर फिर उसमें लीड रोल किया और फ़िल्म जबरदस्त चली। तीसरी अनारकली उनके हिस्से आई तब, जब वह अपने खत्म होते करियर को संभालने की कोशिश कर रही थीं, इस अनारकली से उन्होंने वापसी की, लेकिन अनारकली नहीं, सलीम की माँ के रोल में।  

प्रसिद्ध फ़िल्में - सिनेमा क़्वीन (1926) टाइपिस्ट गर्ल (1926) माधुरी (1928) वाइल्डकैट ऑफ़ बॉम्बे (1927) अनारकली (1928) हीर रांझा (1929) इन्दिरा बी ए (1929) सुलोचना (1933) बाज़ (1953) नील कमल (1968) खट्टा मीठा (1978)

देश की इस मशहूर फिल्म अभिनेत्री सुलोचना की मृत्यु 10 अक्टूबर, १९८३ को हुई थी.  "/>
टेलिफोन ऑपरेटर से बनी देश की पहली सुपर स्टार
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सुलोचना इंडियन फ़िल्म इंडस्ट्री की सबसे शीर्ष अभिनेत्री

आज हम फिल्मे देखते हैं और मजा लेते हैं. सोचो यदि फिल्म में आवाज़ नहीं आये किसी कारन से तो फिल्म का मजा ही चला जाता हैं. परन्तु क्या आपको पता है एक जमाना ऐसे भी था जब फिल्मो में कोई dialogue ही नहीं होते थे. जी हाँ उन फिल्मो को मूक फिल्मे बोलते थे. हम ऐसे फिल्मो की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री के बारे में बात करने जा रहे है. जिन्होंने मूक फिल्मो में अपना नाम सबसे ऊपर रखा हुआ है. उनका नाम है सुलोचना .

अभिनेत्री सुलोचना का जन्म 1907 में हुआ था. सुलोचना को रूबी मेयर्स Ruby Myers के नाम से भी जाना जाता है. ये ही उनका असलो नाम था. सुलोचना 1930 के दशक में सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री थी। 1930 के दौर में सुलोचना इंडियन फ़िल्म इंडस्ट्री की शीर्ष अभिनेत्री थीं। उन्होंने शुरुआत तो मूक फ़िल्मों के समय से की, लेकिन बोलती फ़िल्मों के दौर की शुरुआत में भी उनका सिक्का फ़िल्म इंडस्ट्री पर खूब चला। हिन्दी सिनेमा में विशेष योगदान के लिए 1973 में ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था।

सुलोचना अभिनेत्री बनने से पहले एक टेलीफोन ऑपरेटर थी. १९२५ ऐसा नाम की फिल्म से वे रुपहले परदे पर उतरीं और स्टार बन गई. इस दौरान उन्होंने ५० फिल्मो में काम किया. सुलोचना को हिंदी फिल्मो में उनके योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरूस्कार दिया गया.

 

 

करियर बनाने आये कई उतार-चढ़ाव

मूक फ़िल्मों के दौर में ही सुलोचना के खाते में कई हिट फ़िल्में थीं। बोलती फ़िल्मों के आने के बाद सुलोचना का कॅरियर थोड़ा ठहर गया। सुलोचना असल में क्रिश्चियन थीं और उन्हें ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा बहुत अच्छे से नहीं आती थी। बोलती फ़िल्मों के आने के साथ ही डायलॉग बोलने की दक्षता ज़रूरी हो गई। ये सुलोचना के कॅरियर के लिए एक धक्का था। कुछ वक्त ऐसे ही चला, मगर फिर सुलोचना ने हार ना मानने का फैसला लिया। उन्होंने एक साल का ब्रेक लेकर हिन्दुस्तानी धड़ल्ले से बोलने की तालीम ली और फिर वापसी की। सबसे पहले उन्होंने 1920 के दौरान बनी अपनी फ़िल्मों का रीमेक 1930 के दौरान रिलीज किए। सभी फ़िल्में बहुत सफल हुईं और सुलोचना फिर टॉप तक पहुंच गईं। मगर 1940 से सुलोचना के कॅरियर में ढलान जो शुरू हुआ तो फिर वह संभल नहीं सकीं। नई अभिनेत्रियों के सामने सुलोचना मुकाबला नहीं कर सकीं। चरित्र भूमिकाओं के सहारे उन्होंने वापसी की कोशिश की लेकिन फिर कभी हालात पहले जैसे ना हो सके।

सुलोचना (रूबी मेयर्स) ने अनारकली नाम की तीन फ़िल्में कीं। तीनों एक ही कहानी का रीमेक थीं। पहली अनारकली, जिसमें सुलोचना मुख्य अभिनेत्री थीं, मूक फ़िल्मों के दौर में बनी, जब सुलोचना ने बोलती फ़िल्मों में वापसी की तो उन्होंने अपनी फ़िल्म अनारकली को फिर से बना कर फिर उसमें लीड रोल किया और फ़िल्म जबरदस्त चली। तीसरी अनारकली उनके हिस्से आई तब, जब वह अपने खत्म होते करियर को संभालने की कोशिश कर रही थीं, इस अनारकली से उन्होंने वापसी की, लेकिन अनारकली नहीं, सलीम की माँ के रोल में।

 

प्रसिद्ध फ़िल्में –
सिनेमा क़्वीन (1926)
टाइपिस्ट गर्ल (1926)
माधुरी (1928)
वाइल्डकैट ऑफ़ बॉम्बे (1927)
अनारकली (1928)
हीर रांझा (1929)
इन्दिरा बी ए (1929)
सुलोचना (1933)
बाज़ (1953)
नील कमल (1968)
खट्टा मीठा (1978)

देश की इस मशहूर फिल्म अभिनेत्री सुलोचना की मृत्यु 10 अक्टूबर, १९८३ को हुई थी.

 

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