कीर्तन क्या है और कैसे करें
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सबसे पहले हम ये जाने की कीर्तन का सही अर्थ क्या है.

Kirtan का सही अर्थ मैंने अभी कुछ दिन पहले सुप्रसिद्ध भागवत वाचक Goswami Shri Pundrik Ji Maharaj से जाना उनोहने जो बताया में आज आप लोगो से शेयर करती हूँ.

Goswami Shri Pundrik Ji Maharaj के अनुसार हम जब किसी एक विशेष भगवान् का नाम दिन-रात लेते रहते हैं, या किसी विशेष समय लगातार बोलते हैं वो तो कीर्तन है, जरूर है पर उससे पहले एक आवश्यकता है और वो है –

जिस दिन आपके जीवन में से कीर्ति और तन का आकर्षण खत्म हो गया, उस दिन कीर्तन हो गया.

जिस व्यक्ति को अपने यश की और शरीर की चिंता है वो व्यक्ति गा सकता है पर कीर्तन नहीं कर सकता. वो व्यक्ति मनोरंजन कर सकता है, कीर्तन नहीं कर सकता है.  इसका सबसे बड़ा उदाहरण मीरा का है, जिसने न यश की चिंता की न शरीर की. कीर्ति और तन से ऊपर उठा कर ही रास्ते में कीर्तन होता है.

Kirtan मतलब राम-राम कहते समय सिर्फ राम ही का ध्यान हो,

Kirtan , राम-राम कहना कीर्तन नहीं है, शिव-शिव कहना कीर्तन नहीं है, बल्कि राम-राम कहते समय सिर्फ राम ही का ध्यान हो, सिर्फ की ही सुधि हो तो कीर्तन है,  जिसको कीर्ति की चिंता होगी वो क्या रस्ते में नाच सकता है क्या, कभी नहीं. कीर्तन के लिए तो महा प्रभु बनना पड़ेगा.  चैतन्य महाप्रभु निकल पड़े गलियों में, निकल पड़े मोहल्लों में. महाप्रभु को देख कर लगता है, जिसको तन की चिंता होती है वो कभी सन्यास नहीं ले सकता. तो कीर्तन का सही अर्थ है भगवान् का नाम लेते समय सिर्फ भगवन नहीं ही याद रखें. कम से कम कीर्तन करते समय दुनिया दारी को दूर रखें.

सही भी है, यदि हम कीर्तन करते समय दुनिया की ही सोच रहे हैं, तो फिर कीर्तन कर ही क्यों रहे है, भगवान् ने तो नहीं कहा की तुम मेरा नाम जबरदस्ती लो, वो तो कहते भाई पहले अपना काम निपटा लो, फिर सुकून से, चैन से, मेरा नाम लेना, मेरा भजन करना.

कीर्तन कोई काम नहीं, कीर्तन तो धुन है, कीर्तन तो लय है, निरंतर बहने वाली वायु है.

कीर्तन के पीछे कोई मकसद नहीं होता, कीर्तन तो ईश्वर के करीब होने का, उसमे डूबने का माध्यम है.

कीर्तन का बड़ा अद्भुत काम है, कीर्तन वासना को मिटाता है, कीर्तन काम को मारता है. और कामवासना मिटा जाये तो व्यक्ति शुद्ध हो जाये. कीर्तन ये ही करता है.  कामवासना कैसे मिटें – कीर्तन में यदि सिर्फ कीर्तन हो, तो कीर्तन होता होता.  कीर्तन में उस कुम्हार की प्रशंसा है जिसने ये खूबसूरत दुनिया बनाई. मगर हम दुनिया का ही कीर्तन करे चले जा रहे हैं. हम उस परम तक नहीं पहुँच पा रहे हैं.

भजन और कीर्तन में अंतर –

ईश्वर का नाम बार-बार दोहराना भजन है, मगर इसी नाम को पूरी तल्लीनता से बोलना कीर्तन है. कीर्तन का फल वैसे तो भजन ज्यादा होता है. मगर कीर्तन वो सही है जिसमे फल की कोई फिक्र न हो.  तो दोस्तों, हम सबको कीर्तन ही करना चाहिए. जिससे ईश्वर के उच्च कोटि की कृपया हम पर रहे.

|जय श्री कृष्णा |

News Reporter

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