हर दिशा में जाने के लिए एक ग्रह उस दिशा को नियंत्रित करता है जिसको ग्रह दिक बोलते है इस प्रकार 9 ग्रह और एक लग्न मिला कर दस दिक यानी 10 दिशाओ में हर एक का प्रधिनित्व एक ग्रह करता है । ज्योतिष के दैनिक उपयोग में ऊपर नीचे के दिक को छोड़ 8 दिक लेते है जैसे पूर्व का सूर्य आग्नेय का शुक्र दक्षिण के मंगल आदि यह ग्रह उस दिशा यानी अपने कारकत्वों के हिसाब से जातक की मदद करते है। इस हर दिक में एक ग्रह इनको रोकता है जिसको काल ग्रह कहते है सूर्योदय से सूर्यास्त तक आठो ग्रह के काल होते है ऐसे ही सूर्यास्त से सूर्योदय के बीच भी 8 काल होते है। राहु की दृष्टि कुंडली के पंचम, सप्तम और नवम भाव पर पड़ती है। जिन भावों पर राहु की दृष्टि का प्रभाव पड़ता है, वे राहु की महादशा में अवश्य प्रभावित होते हैं। ज्योतिष शास्त्र में इस ग्रह को पाप का राजा माना जाता है कहा जाता है की जब राहु की महादशा या अन्तर्दशा आती है तो व्यक्ति एक बार बीमार अवश्य पड़ता है उपाय:

राहु और केतु एक ही हैं एक धड़ है तो एक मस्तक. मस्तक का नाम राहु और धड़ का नाम केतु पड़ा.

अब जानते हैं की इनका जनम कैसे हुआ ?

 

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार महर्षि कश्यप की पत्नी दनु से विप्रचित्ति नामक पुत्र हुआ जिसका विवाह हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका से हुआ। राहु का जन्म सिंहिका के गर्भ से हुआ। आपको समुद्र मंथन की कहानी तो पता ही होगी फिर भी में याद दिला देती हूँ जब समुद्र मंथन में अमृत कलश निकला तो सभी देवताओं को अमृत बाटने की सोची गई, जब अमृत बटा गया तो देवताओं की पंक्ति में बैठकर राहु ने चोरी से अमृत पी लिया था। ये खबर मिलते हैं भगवन विष्णु ने चक्र से उसका सिर काट लिया। क्योंकि राहु अमृत पी चुके थे, इसीलिए वह अमर हो गये। उनका मस्तक 'राहु' और धड़ 'केतु' हो गया। ये खबर भगवन विष्णु को सूर्य और चन्द्रमा ने दी थी इसलिए ये राहु केतु इनको ग्रहण करते हैं जिसे हम सूर्य और चंद्र ग्रहण कहते हैं.

 

राहु केतु से जुडी हुई कुछ धार्मिक बातें -

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राहु काल के बारे में आप क्या जानते हैं?
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हर दिशा में जाने के लिए एक ग्रह उस दिशा को नियंत्रित करता है जिसको ग्रह दिक बोलते है इस प्रकार 9 ग्रह और एक लग्न मिला कर दस दिक यानी 10 दिशाओ में हर एक का प्रधिनित्व एक ग्रह करता है । ज्योतिष के दैनिक उपयोग में ऊपर नीचे के दिक को छोड़ 8 दिक लेते है जैसे पूर्व का सूर्य आग्नेय का शुक्र दक्षिण के मंगल आदि यह ग्रह उस दिशा यानी अपने कारकत्वों के हिसाब से जातक की मदद करते है। इस हर दिक में एक ग्रह इनको रोकता है जिसको काल ग्रह कहते है सूर्योदय से सूर्यास्त तक आठो ग्रह के काल होते है ऐसे ही सूर्यास्त से सूर्योदय के बीच भी 8 काल होते है।

राहु की दृष्टि कुंडली के पंचम, सप्तम और नवम भाव पर पड़ती है। जिन भावों पर राहु की दृष्टि का प्रभाव पड़ता है, वे राहु की महादशा में अवश्य प्रभावित होते हैं। ज्योतिष शास्त्र में इस ग्रह को पाप का राजा माना जाता है कहा जाता है की जब राहु की महादशा या अन्तर्दशा आती है तो व्यक्ति एक बार बीमार अवश्य पड़ता है

उपाय:

  • भगवान शिव के रौद्र अवतार भगवान भैरव के मंदिर में रविवार को तेल का दीपक जलाएं।
  • शराब का सेवन कतई न करें।
  • लावारिस शव के दाह-संस्कार के लिए शमशान में लकड़िया दान करें।
  • अप्रिय वचनों का प्रयोग न करें।
  • पक्षियों को प्रतिदिन बाजरा खिलाएं।
  •  सप्तधान्य का दान समय-समय पर करते रहें।
  •  एक नारियल ग्यारह साबुत बादाम काले वस्त्र में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें।
  •  शिवलिंग पर जलाभिषेक करें।
  •  अपने घर के नैऋत्य कोण में पीले रंग के फूल अवश्य लगाएं।
  •  तामसिक आहार व मदिरापान बिल्कुल न करें।

राहु काल के बारे में आप क्या जानते हैं? 1

राहु और केतु एक ही हैं एक धड़ है तो एक मस्तक. मस्तक का नाम राहु और धड़ का नाम केतु पड़ा.

अब जानते हैं की इनका जनम कैसे हुआ ?

राहु काल के बारे में आप क्या जानते हैं? 2

 

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार महर्षि कश्यप की पत्नी दनु से विप्रचित्ति नामक पुत्र हुआ जिसका विवाह हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका से हुआ। राहु का जन्म सिंहिका के गर्भ से हुआ। आपको समुद्र मंथन की कहानी तो पता ही होगी फिर भी में याद दिला देती हूँ जब समुद्र मंथन में अमृत कलश निकला तो सभी देवताओं को अमृत बाटने की सोची गई, जब अमृत बटा गया तो देवताओं की पंक्ति में बैठकर राहु ने चोरी से अमृत पी लिया था। ये खबर मिलते हैं भगवन विष्णु ने चक्र से उसका सिर काट लिया। क्योंकि राहु अमृत पी चुके थे, इसीलिए वह अमर हो गये। उनका मस्तक ‘राहु’ और धड़ ‘केतु’ हो गया। ये खबर भगवन विष्णु को सूर्य और चन्द्रमा ने दी थी इसलिए ये राहु केतु इनको ग्रहण करते हैं जिसे हम सूर्य और चंद्र ग्रहण कहते हैं.

 

राहु केतु से जुडी हुई कुछ धार्मिक बातें –

  • ग्रहों के साथ राहु भी ब्रह्मा की सभा में बैठता है।
  • पृथ्वी की छाया के साथ राहु भ्रमण करता है।
  • राहु का रथ अन्धकार रूप है। इसे काले रंग के आठ घोड़े खींचते हैं।
  • राहु की महादशा 18 वर्ष की होती है।
  • कुण्डली के बारह भावों में राहु का फल अच्छा भी होता है और बुरा भी, ये निर्भर करता है की वह किस घर में बैठा हुआ है.
  • राहु की प्रकृति चालबाज, मक्कार, नीच, जालिम होती है और सोचने की ताकत, डर, शत्रुता के गुण होते हैं.
  • राहु को शांत करने का सामान्य मंत्र है – ॐ रां राहवे नम:’

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